माया (भाग-10):- माया अर्थात् स्त्री या इच्छाएँ , ये वैसे तो हर समय आपके आस पास मंडराती रहती हैं लेकिन जैसे ही आप इन्हें पकड़ने का प्रयत्न करते हैं अर्थात् इनके ग़ुलाम बनते है ये आपसे दूर भागने लग जाती है और आपको नचाना शुरू कर देती है, और यदि आप इनसे छुटकारा पाने की कोशिश करोगे तो ये आपके पीछे भागना शुरू कर देती हैं। मतलब माया या स्त्री या इच्छाएँ ये कभी आपको चैन से नहीं जीने देती । आपको हमेशा काम पर लगाये रखती है। यही शक्ति या ऊर्जा है जो कर्म उत्पन करती है। इसलिए स्त्री या माया या इच्छाओं से दूर भागने का अर्थ है आप कर्म नहीं करना चाहते अर्थात् आप आलसी हैं । आजकल मैं अधिकतर युवाओं को देख रहा हूँ कि वे माया के इस खेल से दुखी होकर शराब या दूसरे नशे से इस कर्म से बचना चाहते हैं, अर्थात् वे दरअसल आलसी हैं। यदि आपने शिव पुराण पढ़ा हो तो आप जानते होंगे कि शिव ने ही सर्वप्रथम अपने को दो भागों में विभक्त करके शक्ति के रूप में नारी को उत्पन्न किया था। अर्धनारीश्वर रूप में, ताकि विश्व में स्वचालित सृष्टि का जन्म हो अर्थात् कर्म उत्पन हो। इसलिए इच्छाओं या स्त्री या माया के इस व्यवहार से दुखी ना होकर इस का मूल उद्देश्य समझते हुए इस शक्ति का प्रयोग सोच समझ कर करते हुए आप इस सृष्टि के निर्माण का ख़ुद को एक हिस्सा समझ कर जियें और अपना कर्म करते रहें। #माया_सीरीज_गोपाल_कपूर2 आप इस हैशटैग को टिक करके मेरी माया सीरीज के बाक़ी पार्ट सर्च करके पढ़ सकते हैं।
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