माया ( भाग 5) :- माया या स्त्री या इच्छाएँ तीनों एक ही हैं। इनका व्यवहार आपकी अर्थात् पुरुषों की सोच से बिल्कुल उल्टा होता है। आमतौर पर एक शरीफ और छोटी आयु का लड़का या बहुत ज़्यादा आदर्शवादी पुरुष यह सोचता है कि सच्चा प्रेम करने से स्त्री या माया आपकी ओर आकर्षित होती है यह बात बिल्कुल ग़लत है। माया या स्त्री सिर्फ़ उसी पुरुष से प्रेम करती है जो उससे खेल सके , उसका व्यक्तित्व प्ले बॉय की तरह हो। यह उसकी बेसिक इंस्टिक्ट होती है जो उसके अवचेतन मन में होती है, लेकिन उसका दिमाग़ सोचता कुछ अलग है दिमाग़ से वह ऐसे पुरष को प्यार करती है जो उससे प्रेम करे , उसकी केयर करे , उसे सुरक्षा दे। लेकिन उसके अवचेतन मन की प्रकृति इससे बिल्कुल अलग होती है वह अपने अवचेतन मन से उस पुरुष से ज़्यादा प्रेम करती है जो उसके लिये केयरलेस हो, उससे झूठ कहे, उसे धोखा दे और उससे प्रेम ना करे , उसे हर समय तंग करता रहे। उसकी यह इंस्टिक्ट अपनी शक्ति स्वरूप के कारण होती है वह एक बिगड़ैल पुरुष को अपनी शक्ति से सुधारना चाहती है अर्थात् सृजन करना चाहती है।इसी कारण बहुत अधिक ऊर्जावान स्त्री अधिकतर बिगड़ैल पुरुष की ओर जल्दी और ज़्यादा आकर्षित होती है बजाये सुलझे और समझकार पुरुष के। स्त्री का यह द्वन्द उसे हर समय परेशान करता है। इसी कारण आप देखेंगे किसी भी पुराने चित्रकार की पेंटिंग में एक तरह दौड़ता हुआ घोड़ा जो केयरलेसनेस , आज़ादी का, मौज मेले का प्रतीक होता है । दूसरी तरह मकड़ी का जाला पुराने संदूक कबाड़ जो एक बंधन घर गृहस्थी और सुरक्षा का प्रतीक होता है । दिखाया गया होता है और इन दोनों के बीच कोई स्त्री जो द्वन्द में है दिखाई गई होती है। स्त्री एक तरफ़ आज़ादी, केयरलेसनेस, और दूसरी तरफ़ बंधन चाहती है। और स्त्री के इसी द्वन्द भरी प्रकृति के कारण हर पुरुष कभी समझ ही नहीं पाता कि वह उससे प्रेम करती भी है या नहीं । यही माया स्वरूप स्त्री अपनी इसी प्रकृति के कारण शव रूपी पुरुष(शिव) को अपनी स्त्री रूपी शक्ति के कारण हर समय कुछ ना कुछ कर्म करने के लिए प्रेरित करती रहती है। पर ध्यान रखें माया अर्थात् स्त्री कभी किसी की नहीं हो सकती वह सिर्फ़ पुरुष रूपी शव को चालायमान रखने की ऊर्जा मात्र है। जिस समय पर कोई भी माया या स्त्री अपने इस द्वन्द के बिल्कुल बीच की स्थिति में होती है उस समय अंतराल में वह डिप्रेशन की स्थिति में होती है। और जिस समय पर कोई पुरष भी अपने प्लेबॉय और केयरिंग बॉय वाली प्रकृति के चेंज ओवर की स्थिति में होता है उस समय अंतराल में वह भी बहुत मानसिक पीड़ा के दौर से गुज़र रहा होता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना होता है पुरुष एक समय में सिर्फ़ एक ही स्थिति में होता है या केयरिंग बॉय या प्लेबॉय। लेकिन स्त्री हर समय दोनो स्थितियों में रहती है अर्थात् हर समय द्वन्द। #माया_सीरीज_गोपाल_कपूर2
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