बुरी ग्रह्वस्थिती या बुरी ग्रह दशा से बचने के उपाय ज्योतिष, वेदिक, वैज्ञानिक आधार पर:- यथा देह यथा ब्रम्हांड यह हमारे यजुर्वेद में लिखा है। इन्हीं शब्दों में आप के बुरे समय का समाधान भी छिपा है। अगर संसार को समझना है तो हमें अपने देह को मन को समझना पड़ेगा और अगर खुद को समझना है तो संसार को समझना पड़ेगा। शिव पुराण में वर्णित है भगवान शिव कहते हैं कि शून्य से ही सब कुछ बना है और शून्य में ही समा जाता है। अद्वैत का द्वैत में बदलना ही सृष्टि के निर्माण का कारण है। Singularity can not exist in physical form. शून्य का दो भागों में टूटने से स्पेस और मैटर बनता है। जितनी शक्तियां हैं वे स्पेस और मैटर के बीच का संतुलन बनाए रखने के लिए काम करती हैं। जैसे gravitational force या electromagnetic force इसी प्रकार जीवन में जितना कुछ पॉजिटिव उतना ही नेगेटिव भी मिलता है और ये दोनों एक साथ एक बराबर हमारे जीवन में होती है। लेकिन हम सिर्फ नेगेटिव पर ही फोकस बनाए रखते हैं। अगर हमें अपने बुरे समय में यह भी पता हो कि इस बुरे समय में उसका अपोजिट भी हमारे साथ ही है इसी पल और हैं उसको पहचान सके तो हमे कभी दुख ही ना हो। जैसे मैं अपनी हर पोस्ट या ज्योतिषीय भविष्यवाणियां इस प्रकार से लिखता हूं कि उनको पढ़ने से सबसे पहले मेरी विचारधारा के विरोधी मुझे उल्टा सीधा लिखने लग जाएं और मुझे लोग ज्यादा से ज्यादा बुरा लिखें। और मेरे विरोधियों कि संख्या बहुत ज्यादा हो जाए। कई बार मेरे मित्र मुझे समझाते हैं कि आप ऐसे लोगों से क्यों उलझते हो। लेकिन मै और ज्यादा उलझने की कोशिश करता हूं।यह मैं अपना कर्म समझ कर करता हूं। क्योंकि मुझे पता है सिंगुलैरिटी या एक पक्ष कभी अकेला exist कर ही नहीं सकता। क्योंकि जितने ज्यादा विरोधी लोग होंगे उतने ही समर्थक भी हो जाएंगे। आप चाहें तो यह कर्म सीधे तरीके से करके देख लें। आप अच्छे बनने की कोशिश करे अच्छी अच्छी बातें लिखे उससे पहले आपको समर्थक दिखने शुरू हो जाएंगे लेकिन साथ ही उतने विरोधी भी उत्पन हो जाएंगे पर आपकी नजर में वे बाद में आयेंगे। इसलिए दुनिया में कुछ भी कर्म करने से जितना समर्थन उतना ही विरोध भी मिलेगा। Every action has equal and opposite reaction हर क्रिया की समान और विपरित प्रतिक्रिया होती है यह फिजिक्स का नियम हमारे हर कर्म में भी लागू होता है। हमारा हर कर्म एक समुद्र मंथन की तरह होता है अमृत के साथ विष का उत्पन होना निश्चित होता है। अब यह हमारी मनोस्थिति पर निर्भर करता है कि हम अपने कर्म से उत्पन अमृत को ग्रहण करते हैं या विष को। इसलिए जब हमारी मनस्थिति ग्रहों की स्थिति के कारण गड़बड़ होती है तो उस समय हम अपने कर्मों से उत्पन सिर्फ विष को ही ग्रहण करते है हमारा ध्यान साथ में उत्पन हुए अमृत की और जाता ही नही। जबकि अच्छी ग्रह स्थिति में यह उल्टा होता है हमारा ध्यान हमारे कर्मों से उत्पन अमृत पर फोकस होता है और विष पर हमारा ध्यान जाता ही नही। इसीलिए मै जानबूझ कर ज्योतिष गणना को इस तरह से लिखता हूं जिससे सबसे पहले विरोधियों कि पूंछ में आग लग जाए और वे मुझे बुरा भला कहने लग जाएं। लेकिन मेरे इस कर्म से इस विष के साथ अमृत भी उत्पन होता है मै सिर्फ अपना ध्यान उस अमृत पर फोकस रख कर उसे ही ग्रहण करता हूं। इस से मुझे कभी किसी की गाली गलौज या बुरे चुभते शब्दों से कभी दुख नहीं होता।
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